संदेश

समस्या और उसका हल

 कभी मुझे लगता है कि जिंदगी इतनी भी आसान नहीं हो सकती जितना हम सोच लेते हैं| जिंदगी के फैसले लेते वक़्त हमें इस बात का अहसास होता है, छोटी छोटी बातें बड़ी बन जाती है | अनचाहे कितनी ही समस्याएं सिर उठाने लगती हैं। और उसवक्त यूँ लगता हैं कि आसान क्या है ,पर जिदंगी की एक बात सबसे अच्छी हैं कि यहाँ हर समस्या में ही हल भी छुपा है,सिर्फ परेशानिय़ों के कारण हम उस हल कों देख नहीं पाते या समझ नहीं सकते।ऐसे समय में जरूरत है अपने नजरिए में बदलाव की।हर परेशानी में एक हल ढूंढने की,एक आशावादी सोच की।सब कुछ ठीक हों जाएगा,सब ठीक न भी हो तो बदलेगा जरूर,यह कठिन समय बीतेगा जरूर, तब तक सब वक्त पर छोड़ कर देखें।जहां आपकी सारी कोशिशें नाकाम जा रही हैं,वहाँ कुछ देर ठहर जाएँ।मनन करें चिंतन करें पर केवल सोंचे।समय ठहरता नहीं हैं तो समस्याएं भी नही ठहर सकती।कुछ पल के ठहराव के बाद फिर कोशिश करें।सफलता अवश्य मिलेगी।
  ज़िंदगी थम सी जाती है जब सोचती हूँ तेरा मिलना यूँ बेसबब,बेवजह तपती रेत पर रजनीगंधा का खिलना बारिशों में तितलीयों का मचलना, स्याह रात में जुगनुओं का निकलना, बेमतलब सा यूँ ही तेरा मिलना, शांत से समंदर पर लहरों का मटकना, गहरे जंगल में मस्तमौला सा भटकना, पतझड़ में गुलाबी कलियों का चटकना, अचानक से यूँ तेरा मिलना, बेसबब, बेवजह …….

ख़ामोश मत रहो

  ख़ामोश मत रहो, जब लगे तुम्हें कुछ ग़लत, तो सवाल उठाओ, अचानक से जब भर जाओ, ख़ामोशी से अंदर तक, चीख़ो, चिल्लाओ और शोर मचाओ, मत हावी होने दो ख़ुद पर इस ख़ामोशी को, इस ख़ामोशी को अपनी आदत मत बनाओ, सवाल करो, ऊँगलियाँ उठाओ, बस ख़ामोश मत हो जाओ, जीने के लिए शोर मचाओ, क्यूँकि अंदर की ख़ामोशी केवल चुप नही, घुटन है उन सभी लम्हों की, जब शब्द थे तुम्हारे कंठ में, पर ज़ुबाँ पर आ नही पाए, ख़ामोशी ने जकड़ रखा था अन्तरमन, और इससे तुम ख़ुद को छुड़ा नही पाए, तो इस ख़ामोशी से पीछा छुड़ाओ, चीख़ों-चिल्लाओ और शोर मचाओ, ग़लत को कहो ग़लत, सवाल करो,ऊँगलियाँ उठाओ, बस, ख़ामोश मत रह जाओ

किसे पता था ?

  किसे   पता   था , ऐसा   कुछ   हो   जाएगा , कोई   अजनबी   यूँ   दिल   के   क़रीब   आएगा , रुके   से   कदम   फिर   चल   पड़ेगें , बेजान   रास्ते   फ़िर   महक   उठेंगें , कभी   थे   अजनबी - अनजान , जैसे   दो   बर्फ़ीले   पहाड़ , खड़े   हों   मुँह   फेरे , प्रेम   की   आँच   से   पिघले   दो   शिलाखंड , बन   हवा   महके   उपवन   दर   उपवन , हवाएँ   कभी   इतनी   ख़ुशनुमा   न   थी , किसे   पता   था , ऐसा   कुछ   हो   जाएगा , रोशन   रोशन   सारा   जहाँ   हो   जाएगा , छोटा   सा   जुगनू   सूरज   बन   जाएगा , फूल   खिलेंगें   दिल   में   ही   नही ,  राहों   में आशा   बन   कोई   बहार   सी   नई   लाएगा , कोई   आएगा   और   दिल ...

मैं छटपटाती हूँ

  मैं   हूँ   इस   भारत   की   स्वतन्त्र   नागरिक , आओ   कुछ   बातें   दिखलाऊँ , किन   किन   बातों   के   लिए हाए   मैं   छटपटाऊँ क्या   मनाऊँ   जश्न   मैं ? अपनी   अधूरी   भौतिक   स्वतंत्रता   पर या   पूरी   असामाजिक   परतंत्रता   पर                                   संविधान   की   बेमिसाल   अक्रियान्वित   समता   पर या   समाज   की   नित   बढती   विषमता   पर क्या   मनाऊँ   जश्न   मैं ? अपनी   सौभाग्यशाली   योग्यता   पर या   उसको   कूड़े   में   डाल   देने   वाली राजनीतिक   मूर्खता   पर अपनी   परंपराओं   की   महानता   पर या   उसे   बेड़ियों   में   बदल   चुकी   अमानुषता   पर क्या   मनाऊँ ...

मूढ़

दुनिया बैठी तबाही के ढेर पर, मर रहा इंसान, छोटा सा इक वायरस, ले रहा है सबकी जान, काम धंधे उजड़ गए सब, सब कुछ हुआ बेजान, गूँगे-बहरे,अंधे बने रहो तुम और बोलो जय श्री राम, आम आदमी हुआ ग़रीबी की रेखा के नीचे, ग़रीबों की तो निकली जान, इकॉनमी का हो हुआ सत्यानाश, दुनिया में छाया अंधकार, गूँगे-बहरे,अंधे बने रहो तुम और बोलो जय श्री राम, स्कूल-कॉलेज सब बंद पड़े, शिक्षा हो गई चौपट, न कोई नीति न ही न्याय, अंधेर नगरी चौपट राजा, हर किसी का हुआ जीना हराम, गूँगे-बहरे,अंधे बने रहो तुम और बोलो जय श्री राम, बीमारी झेलें, ग़रीबी झेलें, हर गड़बड़ हर घोटाले झेलें, और तुम्हारे राज में कितना, झेलना आम आदमी को पड़ेगा सरकार? गूँगे-बहरे,अंधे बने रहो तुम और बोलो जय श्री राम, मूर्तियाँ बनाओ, मंदिर बनाओ अस्पताल मत बनवाना, न सोचना किसी ग़रीब की सुविधा, बीच सड़क पर मर रहे लोग, तुम पत्थरों में ढूँढो भगवान, गूँगे-बहरे,अंधे बने रहो तुम और बोलो जय श्री राम, इस सब से होगा क्या, कोई महिमा मंदिर की मुझे भी समझा दो, बेरोज़गारी हटेगी? अर्थव्यवस्था सुधरेगी? शिक्षा बढ़ेगी? इलाज मिलेगा? टेक्नॉलजी संभलेगी? कुछ तो बता दो, इतना कुछ...

सोच मेरी

लगता   है   तुम्हें   कि   थोड़ी   अलग   है   सोच   मेरी   हाँ   मानती   हूँ ,  चीजों   को   देखने   का   नज़रिया   अलग   है   थोड़ा   मेरा , तुम्हें   तकलीफ़   है   विरोध   के   हर   तरीक़े   से   मेरे , मानते   हो   तुम   कि   अन्य   स्त्रियों   की   तरह   आवाज़   रहे   हमेशा   धीमी   मेरी और   स्त्रियों   की   तरह   सहनशक्ति   बड़ी   हो   मेरी , कैसे   सोचा   तुमने ? जो   राय   होगी   तुम्हारी   वही   होगी   मेरी , तुम्हारे   दिए   या   बनाए   फ़्रेम   में   जड़ी   हो   तस्वीर   मेरी , या   ढल   जाए   तुम्हारी   मर्ज़ी   के   साँचे   में   मर्ज़ी   मेरी , कैसे   सोचा   तुमने ? जो   तुम ...