मैं छटपटाती हूँ
मैं हूँ इस भारत की स्वतन्त्र नागरिक , आओ कुछ बातें दिखलाऊँ , किन किन बातों के लिए हाए मैं छटपटाऊँ क्या मनाऊँ जश्न मैं ? अपनी अधूरी भौतिक स्वतंत्रता पर या पूरी असामाजिक परतंत्रता पर संविधान की बेमिसाल अक्रियान्वित समता पर या समाज की नित बढती विषमता पर क्या मनाऊँ जश्न मैं ? अपनी सौभाग्यशाली योग्यता पर या उसको कूड़े में डाल देने वाली राजनीतिक मूर्खता पर अपनी परंपराओं की महानता पर या उसे बेड़ियों में बदल चुकी अमानुषता पर क्या मनाऊँ ...