सोच मेरी
लगता है तुम्हें कि थोड़ी अलग है सोच मेरी हाँ मानती हूँ , चीजों को देखने का नज़रिया अलग है थोड़ा मेरा , तुम्हें तकलीफ़ है विरोध के हर तरीक़े से मेरे , मानते हो तुम कि अन्य स्त्रियों की तरह आवाज़ रहे हमेशा धीमी मेरी और स्त्रियों की तरह सहनशक्ति बड़ी हो मेरी , कैसे सोचा तुमने ? जो राय होगी तुम्हारी वही होगी मेरी , तुम्हारे दिए या बनाए फ़्रेम में जड़ी हो तस्वीर मेरी , या ढल जाए तुम्हारी मर्ज़ी के साँचे में मर्ज़ी मेरी , कैसे सोचा तुमने ? जो तुम ...