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नया दिन

देखो दिन नया निकलता है, वक़्त नए रंग में ढलता है, देखो दिन नया निकलता है, सुबह का सूरज आशा की किरण बन, दिल में उतरता है, देखो दिन नया निकलता है, चहचहाता पंछी नई आस, जीवन में भरता है, देखो दिन नया निकलता है, सुनहरा आकाश अँधेरा गया, इस और इशारा करता है, देखो दिन नया निकलता है, मंद पवन का झोंका, शिथिलता में जान भरता है, देखो दिन नया निकलता है, ठंडी पड़ी घास का अस्तित्व, स्फूर्ति का आह्वान करता है, देखो दिन नया निकलता है, नए फूलों का खिलना, तितली का उड़ना, पतों का मुस्कुराना, मंदिर की घंटियों का बज जाना, उजला-उजला गर्म सवेरा, ज़िंदगी की आज़ान भरता है, देखो दिन नया निकलता है।

दो किनारे

एक इस छोर तो एक उस ओर, नदी के दो किनारे, चुपचाप निहारते, दूर से इक दूजे को, एकटक-एकठौर, दोनों चाहतें हों जैसे, कि हो जाए वो किनारा, भी इस ओर, पड़ती बीच में नदी, शांत सी बहती देखती दोनों के हावभाव, शायद सब थी समझती, दोनों किनारों के मध्य, कभी गूँज उठता, शब्दों का शोर, अंनत रूपों में बरसती, प्रश्नों की बौछार, उत्तर था ज्ञात दोनों को, फिर भी अनगिनत प्रश्न, ले लेते थे आकार, एक था कहता कि स्पष्ट है,यही भाग्य हमारा, दूसरा सुनना चाहता था, केवल वही, जो उसे था सुनना-सुनाना, अपना अधिकार जमाना, नदी दोनों के समझौते पर आतुर, रहती शांत हो दोनों को निहारे, उसे दूर से दिखते, मिल रहे वो किनारे, अब यह मात्र भ्रम था, या सच्चाई किनारों की, कौन जाने, कौन जाने कब बहती धारा ने, दोनों को ओर जुदा किया या मिलाया, बीतता जा रहा समय, पर नदी के दोनों तरफ़, भावों-अहसासों के हीरे जड़े थे, नदी के वो दो किनारे, अलग-अलग हाँ,अलग-अलग खड़े थे…………..

हस्ताक्षर

औरत की बेफ़िक्री, चुभती है अक्सर हर किसी को, औरत की हँसी, अक्सर बेपरवाह सी लगती है हर किसी को, औरत का नाचना, अक्सर बेशर्म होना सा लगता है हर किसी को, औरत की बेबाक़ी, अक्सर स्वछन्द सी लगती है हर किसी को, औरत का प्रेम-प्रदर्शन, अक्सर निर्लज्ज होना सा लगता है हर किसी को, औरत के सवाल, अक्सर बंधन के खिलाफ से लगते हैं हर किसी को, औरत तो है औरत सब समझती है इस जाल को, इस जाल की तमाम रस्सियों को एक ही सूत से बांधा है इस समाज ने जिसका रेशा-रेशा चरित्रहीन कहता है उसे लेकिन सुन ए औरत तू चल अपनी चाल कि नदी भी बहने लगे तेरे साथ -साथ, तू खुल कर हँस कि बच्चे भी खिलखिलाने लगें तेरे साथ-साथ, तू नाच कि पेड़ भी झूमने लगें तेरे साथ-साथ, तू नाप धरती का कोना-कोना कि दुनिया छोटी पड़ जाए तेरे क़दमों के लिए, तू कर प्रेम कि अब लोग प्रेम करना भूलते जा रहे हैं, तू कर हर वो सवाल, जो तेरी आत्मा से बाहर निकलने को धक्का मार रहा हो, तू उठा कलम, और कर हस्ताक्षर, अपने ख़ुद के चरित्र प्रमाण पत्र पर, कि तेरे चरित्र प्रमाण पत्र पर अब किसी और के, इस समाज के, इसके ठेकेदारों के हस्ताक्षर अच्छे न...

क्या हुआ गर?

क्या हुआ गर? जो साथ न तेरा कभी मिला क्यूँ इतनी सी बात पर हो मुझे गिला क्या हुआ गर? जो साथ चल न पाए हम कभी, कहाँ साथ साथ चल पाते हैं यहाँ सभी, क्या हुआ गर? जो मैं बादलों को ढूँढता रह गया यहीं कहीं और बादल बरस गया और कहीं क्या हुआ गर? जो तरसता रह गया कोई तेरे लिए, शायद तू बना ही नही था उसके लिए क्या हुआ गर? जो पा ना सके कभी तुझे, पर जानता हूँ भूल न पायी होगी तू भी मुझे, क्या हुआ गर, जो चाहा वो कभी मिल न पाया, जो पाया वो ही है कुल सरमाया, पाना-होना कुछ ख़ास फ़र्क़ नही बस मन का भ्रम है कहीं थोड़ा कम या ज़्यादा होगा, पर होना हमेशा पाने से कहीं बेहतर होगा पाने से कहीं बेहतर होगा……

साथ

साथ वही है, जो खड़ा तुम्हारे साथ नही, बल्कि खड़ा तुम्हारे पीछे है, जिसके हाथों में तुम्हारा हाथ नही, बल्कि कंधा तुम्हारा, उसके हाथ के नीचे है, जिसे तुम्हारे तन की आस नही, बल्कि आत्मा तुम्हारी खींचे है, जिसे मतलब नही, स्वार्थ नही, बल्कि प्रेम तुम्हारा सींचे है, जो बेशक खड़ा तुम्हारे साथ नही, बल्कि खड़ा तुम्हारे पीछे है।

शब्द

इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम? कैसे बुनते हो ये ताना-बाना? किस्सों की चादर कैसे बिछाते हो? ये गीत-ग़ज़ल के तकियों पर कैसे ख़्वाब बनाते हो? कैसे गिरते हैं तुम्हारे अक्षर उस चादर पर? कैसे उसकी सिलवटों में तुम उम्मीदें छिपाते हो? इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम? कैसे तुम्हारे पन्ने बन जाते हैं कम्बल? घेर लेते हैं मुझे ऐसी दुनिया में जहाँ मैं अदृश्य, और किरदार साकार होते हैं? ऐसे टिमटिमाते भाव कहाँ से बनाते हो तुम? इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम? कैसे लेती हैं भावनाएँ अँगड़ाइयाँ? कैसे अँधेरा भी रोशनी बन जाता है? क्यों रात तुम्हारी कहानियों के बिना अधूरी है? ऐसी क़लम कहाँ से लाते हो तुम? इतने शब्द कहाँ से लाते हो तुम?

अभागे

पृथ्वी घर हम सबका, शायद, क्या सच में? हम सबका घर, पर कुछ थे, जो थे आभगे, जो शायद हम जैसे नही थे, मनुष्य नही थे, ढोर की तरह, विचरते यहाँ-वहाँ, मनुष्य होने के अधिकारों से वंचित, ढकेले गए, जहाँ-तहाँ रहे कृपाहीन यह कृपन, होना न होना इनका, आया नही किसी खाते में, पृथ्वी पर यह कहीं, भी रहे, कूड़ेदान ही, समझे गए, रहे घर में, पर रहे,बाहर, अपनी जगह, को तरसते, यह लोग, यह अभागे लोग, सहेजे जाने की, सभी योजनाओं से दूर, यह मज़दूर, अभागे मज़दूर

विदा किया

विदा किया , जा तुझे विदा किया , जिस तरह पंछी दे देते हैं विदा , नही रखते हैं कोई अपेक्षा जिन्हें देते है जन्म , बिना किसी स्वार्थ के , छोटे से अपने हिस्से को , खिलाते - पिलाते , संभालते - बताते , उन्हें उड़ना सिखाते , लम्बी उड़ान के लिए करते तैयार , बिना स्वार्थ के , देते उन्हें आसमान , जब सीख जाते वह उड़ना , छोड़ फिर जाते उनका साथ , न मोह का बँधन न स्वार्थ न कोई उम्मीद , न आस न प्रतिकार , करती हूँ विदा तुम्हें , उसी प्रकार , तुम्हारे हिस्से का आसमान , तुम्हें है पुकारता , भरो ऊँची उड़ान , और छू लो अपने सुनहरी सपनों को , तुम्हारी उड़ान , देगी मुझे स्वार्थहीनता , मोह का अंत , मेरे वजूद को अंनतता , ख़त्म होंगे अध्याय , अधिकार और एहसान के , तुम्हारी उड़ान होगी मेरा मुक्तिबोध ....