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मई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जगाना

दिखा कसाईखाने के दबड़े में, इक मुर्ग़ा, बेबस हालातों में, लाचार मुर्ग़ा, पंजे मुड़े हुए, पंख टूट कर बिखरे, तो कुछ जुड़े हुए, इस दुशवारी में भी पर, गर्दन थी उसकी अकड़ी हुई, पूछा मैंने, इस हालात में भी गरिया रहा है, बेटा शाम को तू मुझे किसी प्लेट में, नज़र आ रहा है, चल आज इक बात बता, सुबह होने से पहले ही है तू उठ जाता, बिना किसी आलस्य के अपना धर्म निभाता, हर रोज़ बाँग देकर मनुष्य को है जगाता, फिर भी तू है परोसा जाता, तू ही काटा जाता, मेरी सारी बकवास सुनने के बाद, मुर्ग़े ने मुँह खोला और बोला, सुन लड़की इतिहास गवाह है, जो समाज को है जगाता, वो सबसे पहले है काटा जाता, जगाना अपराध की श्रेणी में है आता, बस इस अपराध की सज़ा हूँ मैं पाता, इसलिए काट के हूँ परोसा जाता, सुन कर मुर्ग़े की बात, निशब्द थी मैं, मौन रहा फिर कई घण्टे मेरे साथ, मौन, केवल मौन…..

सपना

जानती हूँ मैं , बहुत कुछ है खोया, फिर भी हार कहाँ मानी मैंने, हर रोज़ एक नया ही सपना है बोया, रोज़ एक एक सपने का क़द बड़ेगा, कुछ होंगे मेरे साथ, कुछ होंगे पूरे, कुछ रहेंगे आधे-अधूरे, फिर भी टूटेगी नही आस, और हर रोज़ इक नया सपना , मैं सँजोती रहूँगी, मैं बोती रहूँगी.........

वही लड़कियाँ

वही लड़कियाँ, केवल वही लड़कियाँ, जो देखती हैं खिड़कियाँ खोल कर खुले आसमान को, झाँकती नही हैं दरवाज़ों की दरारों से, केवल वही लड़कियाँ, जिन्हें आता है,प्रश्न करना,ऊँगली उठाना, घबराती नही है जो दलीलों,तकरारों से, केवल वही लड़कियाँ जिन्हें पता है फ़र्क़ मूढ़ता और संस्कारों में, जो डरतीं नही भीड़ से, बाज़ारों से, केवल वही लड़कियाँ जिन्हें चाहिए अपने हिस्से की बारिश, जो नही करती समझौता चंद फुहारों से केवल वही लड़कियाँ जो आरंभ करती है अपना ही अध्याय, जो नही रखती कोई जुड़ाव इतिहासकारों से, केवल वही लड़कियाँ, जो तोड़ती हैं वर्जनाएँ,बंधनों को, जो नही रखतीं ख़ुद को नियमों के दायरे में, केवल वही लड़कियाँ, जो देखतीं हैं प्रश्नचिन्ह हर पूर्णविराम से पहले जो नही बंद होती प्राचीन घेरों और विचारों में, केवल वही लड़कियाँ, बदलेंगी परिपाटी को,और बनायेंगीं नयी राह, आने वाली उन जैसी लड़कियों के लिए, केवल वही लड़कियाँ…..

आख़िरी बैंच

वह बच्चे हाँ वही बच्चे, जो बैठते हैं कक्षा की आख़िरी बैंच पर जिनके हाथों की मुठ्ठियों में भरी रहती है दुगनी आज़ादी जो गले में बाँधे घूमते हैं नालायक और डफ़र की तख़्ती अक्सर वे गुम हुई तितलियों को ढूँढते हुए ज्ञान की लालटेन में सेंध लगाना जानते हैं यही तुम्हारी बनाई सीधी लकीर की बाँह मरोड़ कर चल पड़ते हैं अपनी बनाई टेड़ी लाईन के ऊपर क्योंकि वे केवल साँस लेने वाली भेड़ नहीं होना चाहते यकीन करो तुम्हारे फिक्स नियमों को डस्टर से मिटाने के बाद और सारी होशियारी को ताला जड़ने के उपरान्त इन्होंने ही की थी आग की खोज जब तुम पढ़ा रहे थे भेड़ों को कोई बौद्धिक पाठ तो ये चुपचाप तुम्हारे ‘यहाँ अक्ल बँटती है’ वाले बैनर पर काली स्याही पोतकर चल पड़े थे पहिए का आविष्कार करने एक सभ्य लाईन में खड़े होकर जब तुम कर रहे थे पेड़ों को नंगा वस्त्र की चाह में सु – नागरिक शास्त्र के पर्चे बाँटते हुए तब यही आख़िरी बैंच वाले तुम्हारे खिलाफ़ जाकर कपास के बीज बो रहे थे तमीज़दार होने की बहस दरअसल अपने भीतर के जानवर को छिपाने की ज्ञानी कला है इसी ज्ञानी कला से अनजान कुछ आख़िरी बैंचधारी ख़ुद से खींची लाईन पर चलते-चलते ज...

बिंदास लड़कियाँ

हाँ इस शहर की थी हम बिंदास लड़कियाँ लोग देखते हमें, आहें भरते पर औरों को नसीहत करते इनकी तरह मत होना, हाँ,हम में होने जैसा था ही क्या? सो, हम भी खुद की तरफ़ देखने वालों को यही हिदायत देतीं हाँ,हमारी तरह मत होना हमारी तरह होने का मतलब था, बोलना,बिंदास हँसना, खुल कर जीना और रोना, बेतरतीब दुपट्टे का होना, या ना भी होना, आस्तीनों का ऊपर होना, बेपरवाह , लापरवाह होना, दुनिया से पर थी हम इस शहर की जान लड़कियाँ जिन पर शहर था हरदम ऊँगली उठाता परन्तु, हमने इस शहर को बड़ी ही सहजता से अपनाया ऐसे जैसे कोई घर आए, भूख लगे,फ्रिज खोले, जो मिले वो खाए, सोफ़े पर पसरे और टीवी में खो जाए; ऐसे जैसे किसी को नींद आए, बत्तियाँ बुझाए,कम्बल खोले, लेटे और सो जाए। हाँ इस शहर की थीं हम बिंदास लड़कियाँ हमने तब पीया वो ,जो वर्जित था देवी का राक्षसी बनने के लिए जब हमारे पास पीने को बहुत कुछ था जीने को कुछ नहीं। हम शब्द बनीं, ऋतुएँ बनीं रुचियाँ बनीं हम हर वो शय बनीं जो हमें उपलब्ध न थी। ऐसा नहीं है कि हम कुछ और नहीं कर सकती थीं कुछ और यानी, किसी दो कौड़ी की परीक्षा में आ सकती थीं अव्वल, या फिर, मान सकतीं थीं, इस शहर क...

सूरजमुखी

प्रेम के साथ जोड़े जाते हैं अक्सर, गुलाब के फूल, सुर्ख़ लाल रंग लिए है एकाधिकार प्यार का, गुलाब की ही तरह, तभी अचानक नज़र पड़ती है, खेतों में खड़े सूरजमुखी के फूलों पर, इस फूल को प्रेम है सूरज से, उसकी तपिश को झेलते, हँसते-मुस्कुराते, जिस तरफ़ जाता सूरज , उसके पीछे पीछे गर्दन घूमता जैसे कोई अल्हड़ देहाती, नज़रें चुरा कर देखे गाँव के मेले में आई नवयौवना को, और पीछा करे उसका शाम तक, हर रोज़ यही क्रम दुहराना, सूरजमुखी का, क्या प्रेम के लिए उसकी समझ नही दिखाता, फिर क्यूँ हमेशा सब को प्रेम का पर्याय गुलाब ही है समझ आता, जिसमें सूरजमुखी सा समर्पण नही, जो काँटों के साथ है आता, क्यूँ लाल है रंग इश्क़ का, क्या सूरजमुखी का पीला रंग, कम है प्रेम दर्शाता......

इतना मुश्किल भी नही

इतना मुश्किल भी नही, आसानी से मंज़िलों को पा जाना, और मुस्कुराना, सच मानो, इतना मुश्किल नही है, बस एक ही बात है मन को समझाना, बिना रुके बढ़ते जाना, मिले असफलताएँ तो हिम्मत न हारना, फल की चिंता छोड़ कर्म करते जाना, सब कुछ खो देना भी है, अनुभव को पाना, कर्मपथ पर बढ़ते जाना, चिर-स्थायी क्या है यहाँ, जो इतना माया से मोह बढ़ाना, आज जो है, वो कल नही भी होगा, फिर क्यूँ इतना घबराना ! हर रात के बाद निश्चित है सुबह का आना, इसी तरह हर दुख के क्रम के बाद, निश्चित है सुख का आ जाना, असफलताएँ ही है सफलता का मीलपत्थर, तो इनसे क्या पीछा छुड़ाना, सफलता का एक ही मूल-मंत्र, बिना रुके प्रयास करते जाना, कर्मपथ पर बढ़ते जाना....

सवाल-जवाब

एक सवाल और कब तक ? साथ रहोगी या दोगी साथ मेरा , मैं इक मीठा छलावा बन , ठगता रहा हूँ तुझे सदा , मैंने फूल दिए , तुमने बग़ीचा सजा दिया , दिया गर इक बीज तुम्हें , तुमने पेड़ बना दिया , दिया तुम्हें महज़ मकाँ , तुमने ईंट पत्थर को घर बना दिया , हर चीज़ को सज्जा - सँवार कर वापिस , किया है तुमने , मेरी शारीरिक वासना को भी , तुमने प्रेम बना दिया , स्वार्थरहित तुम और स्वार्थी मैं , बोलो स्त्री , कब तक साथ रहोगी या दोगी साथ मेरा … एक जवाब सृजन का शायद कोई नियम रहा होगा , तभी तो विरोधाभास अस्तित्व में आया , आदम और हव्वा बन अवतरत हुए जब हम , तो कोमलता का पर्याय बनी मैं , तो कठोरता का प्रसाद तुम्हारे हिस्से आया , नादानी रूपी साँप ने डँसा जब मुझे , तो समझ का फल तुम्हें खिलाया , बस यहीं से ख़ुद को श्रेष्ठ समझने का , तुम्हारा उपक्रम चलता रहा , बार - बार लगातार , पर यदि होते एक से हम , तो सृष्टि का विघटन , हमने शायद ...