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आज अपने मन की करते हैं

चलो आज अपने मन की करते है, बदलते हैं अपने बनाए नियमों को, मुक्त ख़ुद को सब बंधनों से करते हैं आज अंजुली में अपनी सागर, और बाहों में आसमान भरते है, चलो आज अपने मन की करते हैं, दुनिया की दौड़ में भागते भागते थक हुए हैं, चल थोड़ा आराम करते हैं, शाम को सुबह और सुबह को शाम करते हैं, बदलते है दिन-रात की जगह, दोनों मिल कर रात को दिन और दिन को रात करते हैं, चलो आज अपने मन की करते हैं, बदल देते है पीने पिलाने के नियम, शराब की बोतलों को ठंडी चाय से भरते है चुस्कियाँ लेते है कॉफी की, बीयर की बोतलों में, चल यह गुस्ताखी सरेआम करते हैं, आजाओ कि आज अपने मन की करते हैं, खिलंद्धड़ होने के इल्ज़ाम से ख़ुद को बरी करते है, चलो आज अपने मन की करते है, बोल देते हैं आज सब को सबकुछ उनके मुँह पर, मन में दबाने वाले न अहसास रखते है, चंद लोगों को दिखाएँ आईना, और ख़ुद के चहरे की धूल साफ़ करते हैं, चलो, आज अपने मन की करते हैं।

कहाँ खोए हुए हो

कहाँ खोए हुए हो, वक़्त फिसल रहा हाथ से रेत बन कर, तुम किस उम्मीद में सोए हुए हो, ख़्वाब कभी न बदलेंगे हक़ीक़त में इस तरह, तुम कौन से सपने संजोये हुए हो, जागो! अभी भी है वक़्त, कहाँ खोए हुए हो, भाग्य भरोसे रहने वाले, कभी न पाते मंज़िल अपनी, आलस से असफलताओं को बोए हुए हो, अपने कर्मों से घबरा कर रोए हुए हो, जागो! अभी भी है वक़्त, मानव कहाँ खोए हुए हो उठो, और फिर से जुटाओ हिम्मत, क्यूँ अवसाद और निराशा की गठड़ी ढोए हुए हो, फैंक डालो , इस जंजाल को, भ्रमों के मायाजाल को, आगे की सुध लो,क्यूँ सोए हुए हो, अब कहना न पड़े कि तुम खोए हुए हो….

हम तुम

हम तुम चुंबकिये छोरों से अलग, पर मिलने को आतुर, एक साथ होने को, एक जैसे होने को , पर अलग अलग व्यक्तित्व का मान लिए, तुम तुम और मैं मैं हूँ, बंधनों से तुम तो स्वछंद सी मैं, इक मीठी सी ग़ज़ल मैं तो रॉक कॉन्सर्ट से तुम, काले बादल से तुम तो छमछम बारिश सी मैं, कलकल करती नदी मैं तो समुद्र से शांत तुम, गुनगुन करते भँवरे से तुम तो रंगबिरंगी तितली मैं, रोमांटिक कहानी सी मैं तो जासूसी नॉवेल से तुम, ब्लैक कॉफी से तुम तो अदरक वाली कड़क चाय सी मैं, तीखे मीठे गोलगपों सी मैं तो फीके ग्रीन सैलड से तुम, मौसम की पहली बर्फ से तुम तो गर्मियों की धूप सी मैं, दो अलग अलग वजूद, पर एक से,या एक होने को आतुर, तुम हम, हम तुम

उम्र

मैं उम्र बताना नहीं चाहती हूँ, जब भी यह सवाल कोई पूछता है, मैं सोच में पड़ जाती हूँ, बात यह नहीं, कि मैं, उम्र बताना नहीं चाहती हूँ, बात तो यह है, की, मैं हर उम्र के पड़ाव को, फिर से जीना चाहती हूँ, इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ, मेरे हिसाब से तो उम्र, बस एक संख्या ही है, जब मैं बच्चो के साथ बैठ, कार्टून फिल्म देखती हूँ, उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ, उन्ही की तरह खुश होती हूँ, मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ, और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ, तब मैं किशोरी बन जाती हूँ, जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ, उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ, दरअसल मैं एकसाथ, हर उम्र को जीना चाहती हूँ, इसमें गलत ही क्या है? क्या कभी किसी ने, सूरज की रौशनी, या, चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी? या फिर खल खल करती, बहती नदी की धारा से उम्र, फिर मुझसे ही क्यों? बदलते रहना प्रकृति का नियम है, मैं भी अपने आप को, समय के साथ बदल रही हूँ, आज के हिसाब से, ढलने की कोशिश कर रही हूँ, कितने साल की हो गयी मैं, यह सोच कर क्या करना? कितनी उम्र और बची है, उसको जी भर जीना चाहती हूँ, फिर क्यों न हम, हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ...

आह्वान

वैश्विक स्तर पर फैली एक बीमारी, केवल बीमारी नही एक महामारी, चल रही जंग अभी इस के ख़िलाफ़, जल्द ही जीतेंगे और मुस्कुराएँगे हम, पर सोचा है कभी क्या हम सबने? हर चोट है सीखती इक नया ज्ञान, इससे बचने के बाद, आत्मविश्लेषण पर हो थोड़ा हमारा ध्यान, क्या कर नही रहे थे प्रकृति का शोषण हम? जिससे क्रुद्ध हुई क़ुदरत और पाया यह अभिशाप, जिस गंगा को साफ़ करने में ख़र्च हुए, करोड़ों रूपए और साल, वो दो महीनों में ही हो गयी,निर्मल पाक़ताल, प्रकृति ने भी उज्ज्वल रंग दिखाए, एक साथ दो-दो इंद्रधनुष आसमान में नज़र आए, क्या यह सब नही चाहिए हमको! हमेशा के लिए साफ़,स्वच्छ, निर्मल, तो करें मनन और आह्वान करें, प्रदूषण कम करने का, वायु को स्वच्छ करने का, आत्मनिर्भर बनने का, शुद्धता को अपनाने का, इक नया पेड़ रोज़ लगाने का, जीव-जन्तुओं के संरक्षण और जंगलों को बचाने का, अपना कार्य स्वयं कर, आत्मनिर्भर बन जाने का, एक स्वच्छ और आत्मनिर्भर समाज बनाने का, करें सब मिल के आह्वान परिवर्तन लाने का…….

एक चिड़िया

सुबह की पहली धूप की किरण, छन कर आती है जब मेरी बालकोनी में, रंगबिरंगा इंद्र्धनुष छिटका सा जाता है, तभी अचानक इक छोटी सी चिड़िया, नीले पंख लिए आती है अकसर, रंगबिरंगी इस धूप में, नाचती सी लगती है हमेशा मुझे वो, इधर-उधर तलाशती कुछ ख़ाने को, यह चिड़िया पहली बार नही, अक्सर आ जाती है मेरी बालकोनी में, जानबूझ कर छेड़ती, दूर बैठे मेरे शांत कुत्ते को, जो देख कर भी उसको अडोल बैठा रहता, शायद अपने बड़े होने का परिचय देता, या उसे अच्छी लगती उसकी अठखेलियाँ, चिड़िया उसके कान में कहती बहुत कुछ, ऐसा लगता मुझे, और कुत्ता शांत भाव से सुनता सब कुछ, वो हँसती, फुदकती उसके चारों ओर, वो अपने मौन से प्रकट करता स्वीकृति अपनी, दोनों की केमिस्ट्री मुझे कमाल लगती, लगता मानों प्रेम में बँधे हो जैसे, दोनों को बर्दाश्त करना आता है, इक दूसरे को, रोज़ एक ही क्रम दोहराते दोनों, फिर भी बार-बार देखना इन्हें, नया सा लगता, कुछ अच्छा सा लगता, बार बार, हर बार

बेरुख़ी

खुशबू का पीछा करते करते, वीराने में आ पहुंचे, तेरी तृष्णा में हम न जाने, कहाँ कहाँ हैं पहुंचे, तूने छोड़ा जो मुँह मोड़ा, तो क्या हुआ? तेरी बेरुखी का सदका, हम जर्रे से आफताब हुए, आसमां तक पहुंचे, तेरी हर ईंट को बना कर पायदान, मंजिल तक आ पहुंचे, तू साथ हो या न हो, नहीं है अब गिला, हमें जहां पहुंचना था, तेरे बिना भी पहुंचे!

मेरी पहचान

मेरी पहचान , आखिर कौन हूँ मैं? क्या हूँ मैं ? स्त्री या सृजन, करती हूँ सृजन हर पल जीवन का मैं सृष्टि का, भावनाओं, उमंगों और रिश्तों का, पल में रचती इक नया ही स्वांग हूँ मैं, अपने अस्तित्व का, अपनी इच्छाओं का, कहाँ रखती, ध्यान हूँ मैं, सब की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी पाती हूँ मैं, न खुश हो कर भी मुस्काती हूँ मैं, पानी में चीनी सी घुल जाती हूँ मैं, कभी माँ, कभी बहन, कभी प्रेयसी बन जाती हूँ मैं, बिना कहे ही सब समझ जाती हूँ मैं फिर भी सवालों के घेरे में आती हूँ मैं, मैं ही देती अग्नि परीक्षा, फिर घर से भी निकली जाती हूँ मैं , चीर हरण होता मेरा ही, और पतन की वजह भी बताई जाती हूँ मैं, इतिहास से लेकर अब तक, परम्पराओं और मिथ्या में उलझाई जाती हूँ मैं अपने ढंग से ही तोड़ी-मरोड़ी, और फिर बनाई जाती हूँ मैं, हाँ में हाँ मिला दूँ तो ठीक, वर्ना तरह तरह के खिताबों से, नवाज़ी जाती हूँ मैं, गिराई जाती, बाँधी जाती और फ़साई जाती हूँ मैं, पर मैं तो हूँ मैं, कहीं कहीं से खुद को समेट कर, फिर से पूरी बन जाती हूँ मैं, शून्यता का पर्याय हूँ मैं, फिर भी कहाँ इस जग से समेटी जाती हूँ मैं, मेरी पहचान हूँ खुद मैं, मैं ...

रिश्तों के कारोबार में

रिश्तों के कारोबार में, अक्सर हार जाते है कुछ लोग, उलझ जाते है , भावनाओं के नगद और उधार में , अक्सर समझ नहीं पाते, इच्छाओं के बहीखाते और हिसाब को, क्यों चुप है कोई, नाराज़ है या परेशान है या छिड़ी अपनी ही धुन की कोई तान है क्यों किसी की आंखें नम दिल बेहाल है, दिल दुखा है या दुखाया किसी और ने है समझ जाना हर भावना को , कहाँ आसान है? किसी का दिल समझ लेना, या पढ़ लेना चेहरा किसी का, हर किसी के बस में कहाँ यह बात है इसलिए हार जाते अक्सर कुछ लोग, रिश्तों के कारोबार में, भावनाओं के नकद और उधार में ….

क्यूँकर बँधे हैं हम

जीवन है असीम, नहीं बंधा सीमाओं में यह, तो क्यूँकर बंधे हैं हम, हवा है स्वछंद खुली खुली सी, पंछी उड़ते उन्मुक्त उन्मुक्त से, तो क्यूँकर बंधे हैं हम, जल की धारा बहती निश्छल-निर्मल, पेड़ झूम रहे उल्लासित-आनंदित, तो क्यूँकर बंधे हैं हम, चौपाए घूम रहे निडर-निर्भीक, फूल खिल रहें चमन-चमन, तो क्यूँकर बंधे है हम, क्योंकि स्वार्थ वश बाँधा, इन सब को हमने, बस में करना चाहा प्रकृति को, आज ले रही कुदरत, प्रतिकार अपना, और बंधे है हम, अपने ही दोष के परिणामस्वरूप, अपने स्वार्थ हित, बंधे हैं हम, इसलिए बंधे हैं हम, दंड स्वरूप बंधे हैं हम…..